Posts

अपनी ही भाषा 'हिंदी' को एक दिवस के रूप में क्यों मना रहे हैं?

Image
                                                                                  Picture Credit: Amar Ujala भारत की संविधान सभा ने 14 सितम्बर 1949 में हिंदी को राजभाषा का दर्ज़ा दिया. लेकिन यह हिंदी के सम्मान से ज्यादा उस पर कुठाराघात अधिक प्रतीत होता है क्योंकि जिस हिंदी को पूरा भारत राष्ट्रभाषा का सम्मान देता रहा, उसे 1949 में उसेक पद से गिराकर एक गौण राजभाषा का दर्ज़ा प्रदान कर दिया गया. राजभाषा अधिनियम 1963 की धारा 3(5) में यह सर्वसम्मति से प्रावधान किया गया कि जब तक एक भी राज्य एसा रहता है जो अंग्रेजी को हटाकर हिंदी को नहीं अपनाता, तब तक अंग्रेजी सह-राजभाषा के रूप में भारतवर्ष में प्रयोग में लायी जाती रहेगी. इसके बाद भी हिंदी भाषा को ऐसे कई आघात पहुंचाए गये जिससे उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा न मिला. स्पष्ट है कि सम्मानित राजभाषा के रूप में हिंदी के प्रतिष्ठित होने के सभी रास्ते अवरुद...

फिल्म समीक्षा: स्त्री २ (सरकटे का आतंक)

Image
फिल्म: स्त्री २(सरकटे का आतंक) २०२४  डायरेक्टर: अमर कौशिक  कलाकार: राजकुमार राव, श्रद्धा कपूर, पंकज त्रिपाठी, अभिषेक बनर्जी, तमन्ना भाटिया, अपारशक्ति खुराना  केमिओ: अक्षय कुमार और वरुण धवन  IMDb रेटिंग: 7.8/10 बॉक्स ऑफिस: 632.74 करोड़  Photo: Google “मनोरंजन के बिना सिनेमा को पूर्ण नहीं माना जाना चाहिए।” आज से लगभग २ सप्ताह पहले (१५ अगस्त २०२४) फिल्म रिलीज़ हुई और उसी दिन देखने का प्लान बन गया था। सुबह ९ बजे का स्लॉट बुक करके हम पहुँच चुके थे यह फिल्म देखने। इस फिल्म का पार्ट एक कई बार देखा हुआ था इसीलिए पार्ट २ में नया क्या होगा, इसे जानने की उत्सुकता हमसे रोकी नहीं गयी।  फिल्म को देखने का एक दूसरा व महत्वपूर्ण कारण: बिहारी हूँ न इसीलिए ‘पवन सिंह’ का गाना थिएटर में सुनने चली गयी थी।;) फिल्म की शुरुआत एक मुश्किल दृश्य से होती है, एक युवा महत्वाकांक्षी आधुनिक लड़की को एक प्राचीन पितृसत्तात्मक भयावह आत्मा द्वारा हिंसक तरीके से अगवा कर लिया जाता है। मुझे लगा कि इस विषय पर हंसना निश्चित रूप से इस समय राष्ट्र के मूड में नहीं है। हालांकि फिल्म आगे बढ़ी, और पॉप संस्क...

दोस्त की शादी और बैजरो

Image
उत्तराखंड भारत के उत्तर में स्थित एक अद्भुत राज्य है, जिसे देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है। यह राज्य प्रकृति की अनमोल संपदा और पवित्र नदियों के लिए प्रसिद्ध है। इस राज्य में घने जंगल, राजसी पहाड़ और शांत सुंदरता आपको खुद में खोने के लिए मजबूर कर देती है। ऐसे ही एक छोटे से गाँव का चित्रण है, जो  "बैजरो" के नाम से प्रसिद्द है। बैजरो उत्तराखंड के एक खूबसूरत गांव का नाम है, जहाँ  के लोग एक सांझ के ढलक में खो जाते हैं। मैंने और मेरे दोस्तों ने अपने खास दोस्त की शादी में शामिल होने के लिए एक अनोखी यात्रा की योजना बनाने का फैसला किया और पहुँच गये आनंद विहार बस अड्डे अपना सामन बाँध कर। यात्रा की शुरुआत: हमारी यात्रा प्रकृति और सौंदर्य से भरपूर आनंद विहार बस अड्डे से शुरू हुई। ISBT से बैजरो तक का सफर लगभग 380 किलोमीटर का था और हमने अपने दोस्त के साथ बस  में सफर किया। रास्ते में हमें कुछ दिलचस्प गांव भी दिखे, जिनका इतिहास हमें अपनी कहानी बताने पर मजबूर कर गया। विकास से दूर, इन गावों की सांझें अपने एक अलग दुनिया में बसी हुई थी।   और इस सफ़र में अगर मैं हमारे बस ड्राईवर भई...

मेरा आगार : सीतामढ़ी

Image
"मित्राणि धन धान्यानि प्रजानां सम्मतानिव । जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥" अनुवाद : "मित्र, धन्य, धान्य आदि का संसार में बहुत अधिक सम्मान है। (किन्तु) माता और मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर है।" दुनिया में सबके पास एक ऐसी जगह होती है जिसे वे अपना घर कहना पसंद करते हैं। एक ऐसी जगह जो परिपूर्ण तो नहीं है लेकिन यादों का एक अम्बार लेकर आती है। वह जगह जहाँ सभी आपके परिचित होते हैं, वही पुरानी इमारतें, वही सार्वजनिक समस्याएं और स्थानीय लोगों से निपटने का एक परिचित तरीका होता है। ये सभी चीज़ें हमे अपने घर को अन्य स्थानों से अधिक महत्व देने पर मजबूर करते हैं। तो आज मैं यहां, अपने ‘घररररर’ का वर्णन करूंगी। घर शब्द पर अधिक ज़ोर इसीलिए दिया है क्योंकि मुझे अपने घर से बहुत प्यार व लगाव है। मेरे आस-पास के लोग यानि मेरा परिवार, मेरे मित्र व मेरे सभी करीबी लोगों को ये मालूम है कि मुझे अपने घर, उस स्थान से कितना लगाव है। मेरा जन्म ‘सीतामढ़ी’ नामक एक छोटे से शहर में हुआ है।  सीतामढी एक भारतीय शहर है और बिहार के मिथिला क्षेत्र में सीतामढी जिले का जिला मुख्यालय है और तिरहुत ...

महापर्व छठ आ रहा है...

Image
  “आज छठ का गाना सुने न, तो घर का याद आ गया, याद आ गया…वो घाट और घाट की सुन्दरता दउरा और सूप में सजे नारियल और फल  कोसी, बहंगी आउर अंगना में बईठल हाथी” आस्था का महापर्व, हम(बिहारियों) लोगों का त्यौहार कम सुकून नजदीक आ रहा है. हमारे लिए दशहरा जो है वो छठ पूजा के आगमन का सन्देश है और जैसा ‘खान सर’ कहते हैं कि दीपावली छठ पूजा का एडमिट कार्ड लेकर आती है.  वैसे तो सबको छठ के बारे में कुछ न कुछ पता ही होगा. और अगर नहीं पता है तो मेरे अगले आने वाले ब्लोग्स को पढ़ कर उन्हें कई ऐसी जानकारी मिलेगी जो शायद गूगल या कोई अन्य सर्च इंजन न दे पाए. ऐसा इसीलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि मै जो यहाँ लिखूंगी वो आँखों देखा और मन से महसूस किया होगा और इसकी तो बात ही अलग है. आज यहाँ मैंने अपनी उन भावनाओं को लिखने का प्रयास किया है जो हर वर्ष ‘दुर्गा पूजा’ शुरू होने से पहले ही उमड़ने लगती है. न जाने ऐसा क्यों होता है पर मन जहाँ छठ के आगमन की ख़ुशी में झूमता है वहीं घर न जाने की बात जहन में आते ही व्यथित हो उठता है. लोगों के लिए छठ बिहार में मनाया जाने वाला एक महापर्व है, घर से दूर रहने वालों के लिए यह घ...

स्व-प्रेरणा

Image
मेरा मानना है कि दुःख/निराशा एक व्यक्ति के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि हर सिक्के के दो पहलु होते हैं उसी प्रकार दुःख/पीड़ा/दर्द के भी हैं…यह केवल नकारात्मकता लेकर हमारे जीवन में प्रवेश नहीं करती है अपितु अगर हम इसके दुसरे पहलू पर गौर करें तो इससे हमारे जीवन में कई महत्वपूर्ण बदलाव आते हैं। दर्द और संघर्ष के बिना आपके पास ताकत और अपना व्यक्तित्व कभी नहीं हो सकता है। नकारात्मक लोगों के बिना आप अपने जीवन में सकारात्मक लोगों की सराहना कभी नहीं कर सकते हैं। जीवन के उस एक अस्वीकृति के बिना आपको कुछ बेहतर करने के लिए निर्देशित नहीं किया जा सकता था। किसी एक व्यक्ति के यह कहे बिना कि आप यह नहीं कर सकते, आपको किसी कार्य को करने की प्रेरणा नहीं मिल पाती।  दुःख और अवसाद को महसूस किये बिना आज आपके पास करुणा की कमी हो सकती है और शायद कई लोगों में होगी भी। किसी भी दर्दनाक अंत के बिना आपको उस महान नई शुरुआत की ओर नहीं ले जाया जा सकता है।   हर वस्तु/क्षण में एक कारण और एक उद्देश्य अवश्य होता है, और हर यही नही उसमें एक सच्चा आशीर्वाद होता है यदि आप ...

अनुभूति

Image
जब जीवन आप पर बुरे वक़्त के रूप में आप पर कठिन प्रहार करता है, तो वह आपको पूर्णतः बदल देता है। उस एक घटना मात्र से ही आपमें अनेक बदलाव आने लगते हैं। उसके बाद आप एक अलग व्यक्ति बन जाते हैं। और मैं एक उदास, नकारात्मक आत्मा बन गई। मैंने खुद को आश्वस्त किया कि मैं फिर से कभी खुश नहीं रह सकती। ऐसा भी नहीं है कि मैंने इससे लड़ने की कोशिश नहीं की। मैंने वह सब कुछ आजमाया जो लोग आपको सुझाते हैं।  मैंने अनेक प्रेरणादायक फिल्में देखीं। मैंने खूब खुशनुमा गाने सुने। मैंने कई सेल्फ हेल्प बुक को पढ़ना शुरू कर दिया। मैंने प्रेरक वीडियो देखने शुरू किये। मैंने नए दोस्त बनाये। मैं अपने आप को व्यस्त रखने लगी। इन सभी के अलावा मैंने एक यात्रा भी की। लेकिन मुझेमें कुछ भी ठीक नहीं हुआ। और इस कारण मेरा दिल और बुरी तरह टूट गया। मैं इतना असहाय, इतना हताश और इतना प्रयासरत महसूस कर रही थी कि मैंने फिर से खुश रहने के इस मिशन को छोड़ने का फैसला कर लिया। तब, मैंने अपने दुख को अपनी नियति मान लिया। मैंने इसे अपने ऊपर किसी का श्राप समझकर अपना लिया। हालांकि मैं कभी यह नहीं जान पायी कि मैंने इसके लायक होने के लिए क्...